आखी-रात

कूटीजै लिछमी

दारूखोर

सुहाग रै हाथां

नित हरमेस

मनावै बापड़ी,

पण नीं सुधरै

हाथां-बातां।

रोजीनै लेवै टूटै

तीन तिलाक री सौगनां

नसै रै बेसुधपणै तांई

लिछमी रा फूटै भोगना!

दारू साथै रोज रमीजै

सती री मरजाद

आखी रात बोतलां बोलै

डील करै बरबाद।

धिक्क-धिक्क

धिक्कारै खुद नै

बिरथ महसूसै

जमारो रो रींक नैं

चुप हुय लेवै,

दिखै झांझरकै रो

तारो..।

काल रो दिन

सावळ निकळैलो

दिन नीं रेवै

अेक सा..

अंतस बापड़ो

धीरज बंधावै

पण चुभै सुपनां

मेख सा..!

झांझरकै सुरू हुय जावै

पति-परमेसर री चाकरी

तेल मालिस नै सेवा देख

धणियाणी दिखै लाख री!

फिस्स सूं हंस दे

देवता जद

परलोक वीं रो

सुधर जावै..

न्याल हुय जावै

बा बावळी

अजोगतो क्यूंई

याद नीं आवै..।

कुण सी माटी री बणी तूं

किण नैं पूछूं अे नारी,

दिखै बीं सूं बेसी मांयनै

तेरी महिमा है न्यारी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : चन्द्र कुमार सुकुमार ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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