हां,

आज

होय रैयो है

घणो—

कविता रो सरूप विस्लेसण

पण—

होयरी है

कविता खुद

अरथ अनाथ,

अर उणरो विसै

मिनख

फिर रह्यौ है

मगजी मारतो

क्यूंकै—

कोनी करै

‘कोई’

तरळो

कविता रै विसै ‘मिनख’ नै

सबदां रै सांचै मांय ढाळण रो

कविता मांय।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत ,
  • सिरजक : कमल किशोर पिपलवा ,
  • संपादक : भगवतीलाल व्यास ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : आठ, नवम्बर
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