हां,
आज
होय रैयो है
घणो—
कविता रो सरूप विस्लेसण
पण—
होयरी है
कविता खुद
अरथ अनाथ,
अर उणरो विसै
मिनख
फिर रह्यौ है
मगजी मारतो
क्यूंकै—
कोनी करै
‘कोई’
तरळो
कविता रै विसै ‘मिनख’ नै
सबदां रै सांचै मांय ढाळण रो
कविता मांय।