भाजतो-सो वायरो आयो

अर म्हारी तणी माथै

विलखो-सी पसरग्यो

टांगी ही जठै

काल रात री चांदणी मांय भींज्योड़ी

म्हारै अर उणां रै बिचाळै होयी बात

बिणजारा बायरा!

थूं क्यूं आवै

वारूंवार इण दिस,

म्हारी इण तणी-

छै म्हारो सै सिणगार

म्हारी सगळी मनवार

म्हारै इण लैरावत अेकांत

थारो कांई काम?

इब ना आईजै वायरा!

आवै तो करजै खंखारो

जिणसूं होय सावचेत

भेळा कर सकूं

म्हारा सगळा सिणगार।

स्रोत
  • पोथी : मंडाण ,
  • सिरजक : किरण राजुपुरोहित ‘नितिला’ ,
  • संपादक : नीरज दइया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण