स'कडा कै अढाव-खढावै

फूग्यां पाछ भी

पोय लै छै सूंइ में तागो

गडफती रै छै

खतल्यार गोदड़

जोड़ती रै छै

घाघरा-लूगड़ा रै पल्या नैं

हाल भी खगतो मांड’र

पठोरी नई

चढ जावै छै

नसैणी का

आखरी गात्या पै

बेवड़ा का बेवड़ा

पाणी

गाय को

पाळगन्डा में उदा’र

लागत श्राद्धा

पांवां की पगतळ्यान सूं

घुंद्यो गारो

लूलर्या पड़ी हथेली के नीचै

भसका तुणकल्या समेत

हो जावै छै सीदो

घरू दीजो

लूण्या को घी खार

चाल छावळी आऊं छू

व्हा फुरती अर लगन

कद दीखैगी

आजकाल की कोराण्यान में

जे म्हारी बाई में छी।

स्रोत
  • पोथी : मंडाण ,
  • सिरजक : देवकी दर्पण ‘रसराज’ ,
  • संपादक : नीरज दइया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण