एक 

मरबा कै कैई दन प्हैली 
सुरु हो जावै छै मरबो
म्हाँ कयास कराँ छाँ जीबा की
मरबो देखाँ ई कोईनै
जस्याँ हाल मर ग्या होवैगा
कैई फूल डाळ्याँ पै
कैई पत्ता पेड़ाँ पै
अर कैई आस मेड़ाँ पै
तो मिनख का मरबा पै
अतनो हँगामो क्यूँ छै।

दो

मर ग्यो आज को बी दन
जस्याँ प्हैली का दन मर्या छा
जीबा की हूँस लै’र
आँख्याँ है’रती है’रती मरगी
कलमाँ चालती चालती मरगी
अर सबद मरता मरता मर ग्या।
स्रोत
  • सिरजक : किशन ‘प्रणय’ ,
  • प्रकाशक : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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