एक जूनां

इतिहास री जात्रा

इणी तरै

पूरी व्हेगी

मनसूबा

मुकराणा रा म्हेलां में

बांध दिया

कठै है वे हरियाळी रा रूंख

जिण मुजब होया

घणा-घणा सोच

इण जात्रा में

चालतां-चालतां

पगल्या खाग्पा मौच

पण

मिनख्या रा उफाण

कदे नीं बीत्या

म्हें आपरी बाजी

एकै बार भी नीं जीत्या।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत मार्च 1981 ,
  • सिरजक : अर्जुन ‘अरविंद’ ,
  • संपादक : महावीर प्रसाद शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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