गांव सूं शहर
आई डीकरी
या भण’र
'क'
सद्यां री
तळछट रा अभिशाप
ऊं रो पाछो
नीं करैला।
पण, वा भोळी छै
नीं जाणै
गांव अर शहर रो आंतरों
फगत सड़क रो है।
शहर में आंवता-जांवता
वा नीची निंज़रां
सड़क नै देख्या करै
अपणूं घर आवण तांईं।
वा सतोलै
सड़क कित्ती भली
कीं आंतरो नीं जाणै
किणी सूं निफरत नीं करै।
कड़ुआ होंवता
आपणै सोच नै
थाम’र
वा बत्ती जळावै
अर पोळी रै चानणै
हियो चन्नण हो जावै।