मतवाळी मेहनत रो

वरदान

पाय गयो किसान।

आस लटूंबी

आल्यू-दोल्यू

टाबरी हेवगी है

फूल समान।

से पंचा मिल

जोड़ मिलाई

ऊंट री नाड़ मांय

मिनखी लटकाई

बुझग्यो म्हारो

दीवट ज्ञान।

देख्यो, मोटो घर

चोखो गहणों

काळी मूंछां कर

दर पर, आयो बर।

बेटी बिकै बीच बजार

देखे खळक तमाशा नै

धकेळ दीनी काळ रै मूडै

पाळी गोद री आसा नै।

कुण देखे बिगड़ी

जोड़ी

कुण करसी टाबर सूं पूछ

कूण बरजे पंचा रा रासा नै।

गांठ रोकड़ा

परणै डोकरा

पंचा से मिळ जोड़ मिलाई

काळा धन री करतूत

बाई नै खाग्यो

डायजा रौ भूत।

कुण बूछे बाई नै

सै रूळग्या है

रूण-झुण में

नौ-नौ आंसूड़ा पटक्या

बात कोई नहीं जाणी

दाझां बिन पीड़

कदै कुण जाणी।

फेरा पड़ग्या

बाई नै कर दीनी बीर

आकास हिया पर पड्या।

अग पड़ता ही सासरिये...

... पोळ मांय

अध इन्दर बीसाळ जाय चढ्यो।

चूनड़ी हेवगी चीर-चीर

चुडल्यो टूक-टूक

मेहदी रो रंग-सुरंग

वेगत हेवग्यो

बाई हैगी सन्न

सै देखण आळा ही तंग।

अब कुण बोलै

कूण आगे आवै

पंच हैंग

मीठी बातां बणावै

कोई भाग री, कोई विधाता री

कोई करम गति न्यारी बतलावै।

अधकाची कळी, कचरगी

बूढो पूथ्यो, नटनागर रै घर।

नयो जमानो

आयो रे भाया

तोड़ो से मिल पंचा रा घर

रीत रा रायता नै तोडो

पुराणा रीवाज ने छोड़ो...

अंध विश्वास

घणो खोड़ो

इन्हे मारो, धाकलो दौड़ो

सोनो सौ टच

महाका घर रा मेह पंच

नुई बातां ने माना

डायजो मांगण वाला रै

सागे बैठण रो भी पाए

जो करस्या

करस्या आप।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत ,
  • सिरजक : राम निवास शर्मा 'मयंक' ,
  • संपादक : मोहनलाल पुरोहित