हर तरफ लोगड़ा कुरळावै, आकळ-बाकळ सारी दुनिया
कोई कै डैग्यूं को बुखार, कोई कै हुयौ चिकनगुनिया।
सरकारी अस्पताळ मांई तो अेक खाट पर दो सूत्या
अेकानी म्हांको मुन्नो अर पसवाड़ै शर्मा की मुनिया।
उल्टी आवै अर ताव चढ्यौ, सब जोड़-जोड़ में दरद होय
सारी देही धूणी बुखार ज्यौ कई धूंण पटकै धुणिया।
रोटी अक दूध, दवा-दारू, पाणी तकात भी नीं भावै
मूंडो, थे जाणो, कड़ो-ज्हैर, आवै उबाक अर खनखनियां।
माछर को डंक फैल करगो, ताबीज, तिलक, टूणां-टामण
चढगो बुखार तो काम न दे, पन्ना, पुखराज न लहसुणिया।
मछरदानी में घुस्या रहो, कपड़ां का पै’र जिरह बख्तर
नहिं माछर आ’र बजा देसी, सारा सरीर पर हरमुनिया।