ठंडी माटी री टीबड्यां

अर उन्हालै री सिंझ्या माथै बिखर्‌योड़ी चांदणी

मन तो करै है कै‌—

ढूक ढूक नं पीवूं।

पण!

म्हारा रूंग रूंग में रमिज्योड़ो उठाइगिरो भैम

आंख्यां दिखावे—

उधारा सांसां सूं कितरा’क दिन जीवूं?

स्रोत
  • पोथी : मोती-मणिया ,
  • सिरजक : प्रेम शेखावत पंछी ,
  • संपादक : कृष्ण बिहारी सहल ,
  • प्रकाशक : चिन्मय प्रकाशन