कहाणी कहणो नीं सहज काम

नानीसा रोज कह्या करता।

कहाणी रा कोडाया टाबर

नानी री साख भर्‌या करता।

टाबरिया अेकर गोधम सूं

उकतावण लागा नानी नैं।

नानी स्याणी ही, बोली–

आवो नूंवी सुणावूं कहाणी म्हैं।

टाबर कैवण लागा–

जे नूंवी बात सुणावै तो मानां।

राजा-राणी तितल्यां अर परियां रो

नाम आवै तो जाणां!’

नानी बोली– ‘तो आवो,

थांनैं कहाणी नूंवी सुणावूंली।

पण… कोई बिच्चै बोल्यो तो

म्हैं मून धार सो जावूंली।’

दुनिया में देश घणा ई,

देशां-देशां शहर अर गांव हुवै।

गांवां-शहरां में बसत्यां

बस्ती-बस्ती न्यारा नांव हुवै।

ही किणीं देश रै किणीं शहर

कोई बावनियां री बस्ती!

बावनियां री बस्ती में

आणंद-मंगळ मौज रमै मस्ती!

बां बावनियां री बस्ती में

अेकरसी लम्बू आयो सा।

पण बावनियां, बावनियां…

बां नै लम्बू नहीं सुहायो सा।

क्यूंकै तन सूं बेसी मन सूं

बौना हा घणखरा बावनियां।

बां रै भी मांय ईज घणा-जणा

हा, चौपनिया अर छप्पनिया।

बावनियां कैता - लम्बू कारण

आपां सै गट्टा लागां।

लम्बू लागै सिल-बटै ज्यूं

अर आपां तिलचट्टा लागां।

केई कै’ता कै- लम्बू रो

लम्बोपण चोर्‌योड़ो लागै।

नीं जणां, काल रो छोरो

कींकर आपां सूं लम्बो लागै?

अेक चौकड़ी थापित ही

धूंसगर बावनियां री बठै।

नित धोक लागती

हाजरियां हलकारां-हालरियां री जठै।

हा केई तुर्रेदार…

घणा सा हा सूका धूंसागरजी।

पण… दूजां पर थोपी चावै हा

बै सगळा खुद री मरजी।

बस्ती में बीजा डीगा हा,

पण… बै सै रूधा रैता।

हा बंड केई बां में भी, पण…

बै गायां ज्यूं सूधा रैता।

घण कुंत-कसौटी वाळा तोल बताता–

लम्बू टणको है।

बो नहीं खोखळो

बाकी पंसेरी, बो पूरै मण को है।

लम्बू रै मारग ठौड़-ठौड़

बावनियां करै कुचालां रळ

पण… सांई जिणरै साथ,

बिगाड़ै उणरो किसी अगन री झळ?

लम्बू रो कारज भूंडै बै,

सौ बीजा आय सरा जावै।

डस हरखै गिरण घड़ी दो

सूरज चांद मुळकता भळ आवै।

छेकड़… बावनिया चाल चली

लम्बू नैं नाको पावण री

घर नूंत उण नैं उठै ईज

पाती-राछ लेय पधरावण री।

लम्बू नीं हो मन रो मैलो,

बो नूंतै री हामळ भरली

नूतणियां सागै टुरग्यो, अर…

लम्बाई खूंजै में धरली।

घर बावनियां रा

बांरी सोच जिस्या हीणा ओछा हा

के मौड़ा? बांरी छत सूं ऊंचा

लम्बूजी रा गोडा हा।

नीं मायो लम्बू घर में जद

सै हिम्मत कर बा’रै निकळ्या।

लम्बू नै छोलण छूर्‌यां तीर ले

अेकै सागै टूट पड़्या।

छापो छाप्यो–

बस्ती में लम्बू खोटी मनस्या ले’र बड़्यो

चतराई सूं बस्ती वाळा

बैंनै रंगै-हाथा पकड़्यो।

कैय मून धरली नानी

टाबरिया जणा सवाल कियो–

नानीसा! लम्बू मरग्यो?

का बचग्यो? का.... उणरो कांई हुयो?

नानी मुळकी अर बोली–

बो जीवै है, सुणणी में आई।

नानीसा! ईं रो मुतळब

लम्बू बावनियां सूं हार गयो?

नीं साच कूड़ रै हाथां हारै।

नानी समझा’र कह्यो।

‘नित माण सवायो

निरमळ मन वाळा, सांचा, गुणवाळां रो

नीं नाम ले’णियो रैवै पण…

ओछां हथकंडां वाळां रो।

ओछां रै ओछैपण पर दुनिया थूकै,

बां नै जाणै है।

दुर्भाग।

कपटिया सत गरिमा-बळ

ओजूं नहीं पिछाणै है!’

संतोष सूं देख्यो नानी, कै

टाबरियां रा मूंढा पळकै।

जोवै ही कद सूं नींद बाट…

बा सब री आंख्यां में मुळकै!

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : राजेन्द्र स्वर्णकार ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
जुड़्योड़ा विसै