सुणो हो के!

संखद कै

सोवणै बगीचै में

क्यां-की बांस

आवै है?

स्याणी!

अठे का गुलाब तो

कद का

गेलै लाग्या,

इब तो

खाली

गीध अर कांवळा

गन्दगी बरसावै है।

स्रोत
  • पोथी : सुण स्याणी ,
  • सिरजक : भगवती प्रसाद चौधरी ,
  • प्रकाशक : रसकलश प्रकाशन