मुरदै थकां कांध्या बळग्या, ऊंठां में जा घेटा रळग्या।
राई रा पर्वत हो चुक्या, सूई नाकै गज निकळग्या॥
धरम करम री धजा फरूकै, पापीड़ा प्रळय में टळग्या।
धरमी जिका सदाईं धरमी, पाण्डू जा हेमाळै गळग्या॥
थकां धणियां धन रुळतां देख्यो, आंख्यां देख हाण नै सहग्या।
मेह सूंठो नै कोठ्यां फाटी, मोठ बाजरो बाळै बहग्या॥
रोटी-रोटी करता देख्या, आज बै ई नर नेता बणग्या।
भूल गया बै अपणो आपो, पद रै मद में सांमा ठणग्या॥
डाकण ही ऊठां चढ़ घूमी, गांवां रा कई गांव उजड़ग्या।
अै बातां बीतै ईं मौकै, देख-देख नै घणा बिगड़ग्या॥