सरवर अंबिया सुलतांन, सुलतांन अंबिया, सुलतांन सहज सु स्वांम्य।
तकरीर मक्र ताज केसी पड़ीये कांम॥
दुंनियां न हद हजार आलंम, जांण रचनां जोय।
दोसती तेरी नबी महंमद, सरजिया सब कोय॥
पाखांण वंण तिण प्रथमी, सीस तार अंबर सूर।
मोहबती तेरी नबी महंमद, सिरजिया सद्र क सूर॥
न आप नबी नीगवे निकळंक, लेय न जाणे नांम।
छोरू क छोरू न सोमावीत, संभल्य कान्य कलांम॥
हफताद नेज आंण करै, हिसाब लेसी होम।
तो दिन महंमद खरी तपसी, ज्यों वर भाठी भोम॥
कुपतिया ऊपरि डंबर करसी, काल्ही कवि हजार।
छोरुवां ऊपरि छांडिया, महंमद करि तिण वार॥
दोर भिस्त न सुख दुख, दोय देव दीन न दीत।
जीमियात अंबरु आसिकारा, प्रगट क्या तेरी प्रीत॥
तीसुं सिपारा तांहरा, सांभल्य कान्ह सनाह।
तुंही कहिस्यै तुंही करिस्यै, आखिर ते अल्लाह॥
तांहरी सफाति छुटियै, वंधीयै पंडिवान।
तेजीया तांहरा तिण ऊपरि आंणियो ईमान॥