प्रबल गाजि घण बांण घमसांण पैला

मंडि भाण रथ ताण असमाण भालै।

नित्रीठो रीठ देबे रतनाखियो

काल झालां विचै बेग कालै॥

रयण हिंदवांण सुरतांण बळ राखि

वाहाक करि सेल उप्पाड़ि हाथे।

अभिनमै गंगरिण जंग असि उव्वारियो

मदझरां हैमरां नरां माथे॥

हर ब्रह्मा हरि अरिक अचरजि हुवा

टळटळे धरा किर आभ टूटो।

वाहतो रूक गज टूक करतो वडा

जोध हरि जोध जमरूक जूटो॥

साह छळ साहरां दळां नव साहसै

विहंड वंड किया बग झाट वाही।

रूप जोधां छळ राखि राजा रतन

माधावत मिले हरि ज्योति मांही॥

स्रोत
  • पोथी : वचनिका राठौड़ रतनसिंघजी महेशदासौत री ,
  • सिरजक : खिड़िया जग्गा ,
  • संपादक : काशीराम शर्मा, रघुवीरसिंह ,
  • प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै