करसि कबज कारंणी जीव जंम पारधी, दीय फुरमांण्य ज बारि देसी।
असत अचेतन चेतै न कांयै आदमी, आव दिन दिन घटै मरंण एसी॥
मरंण विसारि कांय मांनवी मारयस्यौं, एक दिन आदि करि मरंण अछै।
आज आखरि तेरो कांय तोसु मं करि, प्रांणियां और तूं करिसि पछै॥
खरच खपि आयसी दोसती खुदाय की, माल जो मोमीणां पार पायो।
केवीयां कांय तक सीर नांही करै, आदमी अजरायल आयो॥
उंमति आपो पणि सुं नबी एकला, मारीया अजरायल मोटा।
पार परे उदगार दीनी रजा पकड़ तो, खरा गिण न क्यौं गिण खोटा॥
महलिये मीत्रिये बेटे न क्यौं बंधवे, सगपंणे संमधियै जोवो संणावै।
आखरि तो साध्य नेकी बदी आविसी, नफर गुलांम नं को साथ्य आवै॥
बाळपंण गयो जोबंन गयो आवे जुरा, ज्यौं बराती खड़ा खरी खेलौ।
मुवा रे मुवा रे मुवा रे मुरखो, मारिस्यौं अंति अन्याय मेल्हौ॥
आयो पणि एकलौ अछै पंणि एकलौ, जायस पंणि एकलौ जीतवा जंनां।
भोळवंण भुरे नं देख्य निस धातीयै, धीय पूतां घरां भारिजां धंनां॥
डीकरी डीकरां तिस घरि तांम करि, झुंग पळ जीतवा जुरा खांणी।
पीज न क्यौं प्रांम ज प्यास जाय नहीं, पिलंब छ झीझवां तंणां पांणी॥
सत्रीये सपुत्रे बंध्वे संमेत्रे सगे, नं क्यौं संमरथे न हुवै समासि।
वाट वसन पड़ै न को वाट वाहर चड़ै, ती वसती तंणो किसो वेसासि॥
पारको माल पैमाळ कीजै नहीं, कुलखंणों न होय ज मारीज्यस्यौ काल्हे।
उचरे तेज न सीखियै आतमां, चोरटां नैचड़ा तंणी चाले॥