सदियां री हद लांघ, अणूंतो, अड़ ललकारै रे

घिर नी आया घरां, जिका रो रगत पुकारै रे

हिंवाळो हेला मारै रे!

कित्ती जसोदावां रा कान्हा, रळ्या रगत री फाग रे

कितरी जोगण हुई जवान्यां, खड़ी अुड़ाती काग रे

अूंची चोट्यां कट बिखरै, रतनां रो लेखो लेणो है

संभो जवानां भोम भिळावै, अुणनै अुथळो देणो है

सिर रैतां अर बध मुखड़ा री आब अुतारै रै

हिंवाळो हेला मारै रे!

कुण-कुण सील, सगत मरजादा, आज राम री जाण अुठै

किसड़ा सिमरथ पारथ, गीता-गौरव आज पिछाण अुठै

कुण-कुण भीसम, भींव, करण रो, भुजबल भुजा जगावै रे

परसराम रै प्रण नैं सबळा, छाती किसा लगावै रे।

कुण मायड़ रै आज मुगट री मण्यां संवारै रै

हिंवाळो हेला मारै रै!

जोहर जोवै पदमणियां नै, साका जोवै रजपूती

पातळ जाग! अरावळ रो हेमाचळ मांगै आहूती

सिख्खा चेत! बिरागी बंदा, दख्खण संभा सिवाजी नै

रजवट दुरगादास, जगा! मुगल जगादै गाजी नै

संभळ! सुभास, सुरवां समरां जूझण धारै रे

हिंवाळो हेला मारै रै!

चेत मानखा भ्रस्टाचारी, भामा री पत जावैली

पूतां रा मोह कर्‌यां मावड़्यां, पन्ना धाय लजावैली

करसां, खून-पसीनो कर! दिन दूणो धान अुगाणो है

जबरा जाग मजूर मुलक नै, अूंचो तनै अुठाणो है।

देख बधण रा सुपनां बैरी रळ्या बिडारै रे

हिंवाळो हेला मारै रे!

नेचो राख, हिंवाळा, जागै गांधी रो बळिदान अजै

आजादी पर कुरबान्यां री, जागै घर-घर आण अजै

होंसियार सैतानसिंघ-सा, अडिग सूरवां कितरा है

थां पर हुवै निछावर जोधा, आभै तारा जितरा है

भारत-भोम घणा नर बंका, सीस अंवारै रे

हिंवाळो हेला मारै रे!

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : गिरधारी सिंह पड़िहार ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : जून
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