साध सुचियार संसार सुमारगी, सुकरणी करै बोलै सुबांणी।

मरंण मदवाड़ ता जीव डरै जेतलौ, पाप भव एतलौ डरै प्रांणी॥

अधरंम ता ओसरे मरंण पहलौ मरे, जीव जरंणा जरे जपे जांणी।

कठंण कळिकाळ मां नीर होय निरमळौ, परांनै संबळौ करै प्रांणी॥

सबद सतगुर तणां श्रवंण किये, पाल्य क्रिया दया आंण्य प्रतीत्य।

माल मां माल सुभ्यगतां आपणां, प्यारो सोइ खरचियै विसंन प्रतीत्य॥

पछै हाथ पग धूजस्यै हीण पड़िसी हियै, हुकंम फुरमांण होसी हकारौ।

आवियो अंति उतावळो आळसूं, प्राणियौ छाडिसी सोह पसारौ॥

नीगम्यौं नान्है जोबंन पंण्य जायसी, आवसी आदमी जुरा ऐह।

उचरै तेज अग्यांन असौ नहीं, काया है जोजरी काम्य केह॥

स्रोत
  • पोथी : भारतीय साहित्य रा निरमाता : तेजोजी चारण ,
  • सिरजक : तेजोजी चारण ,
  • संपादक : कृष्णलाल बिश्नोई ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
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