लेखो सतगुर मांग्य जिण दिन लेसी, ग्रीब सोइ दिन गायो।
वधवाड़ी सूं कोल कियो थो, सो दिन आयो जी आयो॥
मरंण चीतारि मं डरि मरंण ते, पाप तायो डरि प्रांणी।
जे क्यों तूं अध्रंम करिस्ये, अंधियारे वीगुचिस रेण विहांणी॥
खाल्यक मारै जीवाळै खाल्यक, करि डंबर करिसी कहार।
नीगरब होय नीगरूर नीकुछ होय, ग्रब न करि गींवार॥
बरस पचास हजार एक दिन, जळता बळतां जायस्यै।
काछ वाच निकळंक न कसीयै, कामां इधक कसीस्यै॥
दिन एक नै बरस अध लाखे, पूरो होयसी प्रांणी।
मार जीवार्य है सब मांगस्यो, लघु वियासै बांणी॥
पांच सै वरस वळे दिन पंच पंथ पसळाद कौ, तां तल्य दोर तप तेजा।
ताह तल्य तसकरां नारि नांखीज्यस्यै, अलह नबी ताज के भया हेजा॥