चेति रे चेति आळस मं करि आतमां, मांग्य मंन महमंहांण मुकति दातार।

पूजीयै पखो पणमेसवर प्रां प्रांणियां, अजुं तुं अड़वीड़ संघणां अवतार॥

केवीयां कोटि जलणी तैण पेटि आवे करे, पहोवरे केत लेखीरि पीधौ।

जांण्य नै जीतव्रा आव अप्रंपरे, लख चौरासीयां वेधौ॥

विसंन विसारता वार कांय विसरौ, जांण्य जीतवा दुख सहीयौ।

अगंन पाड़ौसी उंध कंवल्य आतिमां, षट पचास दीन खड़ो रहीयौ॥

वेगो वा खुंव्यस्य पछतावसी, प्रांणीयां घंणौ पछै।

निरत टाळि सै दुख निरबंस, अध्रंम नांय हुं फळ गळि अछै॥

भगतची भीड़ भगतां तणां भो हरंण, भगति उधारंण भणो भगवांन।

उचरै तेज अळौचि मंन्य आतमां, तातबी जीतज्यै विसंन वखांण॥

स्रोत
  • पोथी : भारतीय साहित्य रा निरमाता : तेजोजी चारण ,
  • सिरजक : तेजोजी चारण ,
  • संपादक : कृष्णलाल बिश्नोई ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
जुड़्योड़ा विसै