ऊंचा गिरवर तरु सघण, अत सुंदर आकार।

ठांम ठांम सरवर भरे, कजळीवन विस्तार॥

गिरां खळक्कै नीर नदि, झरणा झरै अपार।

वनासपति पाखर वणी, विविध अठारै भार॥

कजळीवन कुंजर घणा, म्रग भैंसा म्रगराज।

पसु पंखी सब भांत के, एक एक सिरताज॥

करत केळ वन वन विखै, मद उनमत्त गयंद।

ऊभा करै अकासिया, देख देख दिस चंद॥

स्रोत
  • पोथी : गज उद्धार ,
  • सिरजक : महाराजा अजीतसिंह ,
  • संपादक : नारायण सिंह भाटी ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी शोध-संस्थान चौपासनी, जोधपुर।