मायड़ सुरसत रावळी वा किरपा कद होय।
भासा राजस्थान री, राजस्थानी होय॥
कांई तो सौभाग व्है, इण सूं और अमोल।
रहवां राजस्थान में, राजस्थानी बोल॥
तन सूं तो है ताखड़ो, मूण्डै नहीं जुबान।
मायड़ भासा रै बिना, अैहड़ो राजस्थान॥
मात मिलता मानता, लगसी कितीक बार।
राजस्थानी जन रहां, धीरज कितौक धार॥
केहड़ी आजादी कहो, केहड़ी है सिरकार।
राळै राजस्थान नै, मायड़ भासा कार॥
बिगुल बज्यो जन जाग रो, धर आभो गुन्जार।
राजस्थानी मात री, गून्ज उठी जयकार॥
जनता अब तो जागगी, जाग्या साहित्यकार।
मायड़ भासा मानता, पड़सी अबकै पार॥
धारणा साकां फिरधरां, फिर जोहर फिर जंग।
राजस्थानी मात हित, रणधर देवां रंग॥
राजस्थानी नह चहै, कुणसी है वा ठांव।
जूंझै राजस्थान रा, हर नगरी हर गांव॥
हक खातर लड़वों भलो, सब जाणै सब संसार।
मायड़ भासा रै बिना, जीणो है धिक्कार॥
करतां हाथा जोड़ तो, बीत्या बरस पचास।
भासा रो हक खोसलो, सूरा सूं अरदास॥
भासा है हर प्रान्त री, जगां-जगां पै जोय।
क्यूं ना राजस्थान री, राजस्थानी होय॥
निजरो राजस्थान रै, नहीं रूंख नहि साख।
अनुसूचि वा आठवीं, अरजुण वाळी आंख॥
जिण भासा रचियो पड़्यो साहित रो भण्डार।
राजस्थानी टाळदी, कहदो किण आधार॥
राजस्थानी नीं रह्या, किण मारग थे छोड़।
भारत भर बिखर्या थका, बोलै बारह क्रोड़॥
राष्ट्र भासा हिन्दी बड़ी, नहिं हिन्दी सूं खार।
हिन्दी री हैली कहूं, राजस्थानी सार॥
बोलै न्यारी बोलियां, जिल्ला हळकां मांय।
सब बोल्यां रो भेळ है, राजस्थानी काय॥
जिण री सांची व्याकरण, आछो सो इकरूप।
सब भासा दरबार है, राजस्थानी भूप॥
राजस्थानी जोड़ नै, करदेणी जगमग्ग।
सूची वा संविधान री, नहिं ओपी अजलग्ग॥
राजस्थानी में अबै करणो पड़सी काज।
ढाब सको तो ढाब लो, जनता री आवाज॥
राजस्थानी नैं अबै कर लेवो स्वीकार।
कण-कण राजस्थान रो, कळप रह्यो सरकार॥
आभै नै हरसाय दो, धरती नै थरराय।
राजस्थानी मात जय, नारो दो गुन्जाय॥
दिनड़ो वो दूरो नहीं, बीती मांझळ रात।
सज जासी संविधान में, राजस्थानी मात॥
करसा कवि धंधारती, मजदूरां रो थोक।
राजस्थानी राखवा, सब चेत्या खमठोक॥
जख नाहीं है जीव नै साखी है भगवान।
राजस्थानी मात नै, मिलै न जद लग मान॥