करण प्रथी इक राह, पतसाह आरंभ करै,

कूत कर हलै दरकूंच काबा।

अटक असुरण रा कटक सब उतरै

रहै नत वार हिंदवांण राजा॥

वंस षटतीस मिळ बात यह विचारी,

जोर ओरंग पड़ै सोर जाडौ।

सूर रो सूर केवांण भुज साहीयां,

आभ पड़तां हुवौ भूप आडौ॥

कुंहाड़ा मार जिहाज बटका करै,

ओर सारां घरे मोट धोको।

करां षंग तोल मुख बोल कहीयो करन,

जितै ऊभौ इतै नही जोषौ॥

करन वषांण दुनियांण धिन धिन कहै,

धरम षत्रियांण भुज ऊपर धारू।

अटक सूं लियां हिंदवांण आयौ उरड़,

मुरड़ पतसाह बीकांण मारू॥

स्रोत
  • पोथी : भारतीय साहित्य रा निरमाता- सिंढायच दयालदास ,
  • सिरजक : दयालदास सिंढायच ,
  • संपादक : गिरिजाशंकर शर्मा ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी ,
  • संस्करण : प्रथम