समाधी में बैठ्यां री ही बाबाजी री, बड़ दांई
दाढ़ी बध’र रुपगी जमीन मांय जड़ दांई
तप’र जणा उठ्या,
पड़्या मुंह पाण पूठा,
डांगर दांई बंध’र रहग्या, छूट्या कोनी हड़दां ईं!