तब सुहेम करि कोप सीत अति जगत प्रकास्यौ।

बिषम तुषार अपार भार उपचार सुभास्यौ॥

कंपत चैतन रूप कहा जर जरत समूरे।

तिय हिय लगि लगि बचन चरत मुख सैन सरूरे॥

तिहिं समय जीव सब जगत के भए इक्क नर नारि सब।

उरबसी आय ऋषि निकट तक हिये लाय मोहिं सरन अब॥

स्रोत
  • पोथी : हम्मीर रासो ,
  • सिरजक : जोधराज ,
  • संपादक : श्यामसुंदर दास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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