आरत सुण ने आव, डांवरै रै खैड़ै सूं।

पीर अरज सुण पाल, आव सोनड़ै रड़ै सूं।

कमध आव सुण कूक, धुणारी रां झाड़ां सूं।

कुरची हूंता कहूं, ‘पाल’ कैरू पाहड़ां सूं।

महि मालम थांन मसूरियो, ओथ हूंत खड़ आवजे।

वेगड़ा पाल गऊ वाहरू, धमयक जेज लावजे॥

भावार्थ :- कवि कहता है कि हे पाबू! मेरी करूणाजनक पुकार सुनते ही आप डाँवरा नामक गाँव से आना। हे सिद्ध पुरुष पाबू! आप मेरी विनती सुनते ही सोनड़ा पठार से आना। हे कमधज! आप मेरी फरियाद सुनते ही धणारी के जंगल से, कुड़छी नामक गाँव से तथा केरू के पर्वतों से जाना। इस पृथ्वी पर जहाँ आपका प्रसिद्ध मंदिर समूरिया में हैं, हे गौ-रक्षक पराक्रमी पाबू! आप पल भर भी विलम्ब मत करना तथा अपनी काळवी घोड़ी को हाँकते हुए तत्काल आना।

स्रोत
  • पोथी : पाबूप्रकास-महाकाव्य ,
  • सिरजक : मोडजी आशिया ,
  • संपादक : शंकर सिंह आशिया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै