कुच कंचन घट प्रगट, नाभि सरवर बर सोहै।
त्रिबली पापहँ ललित, रोम राजी मन मोहै॥
पंचानन मधि देस, रहत सोभा हियहारी।
मनहुँ काँम के चक्र, उलटि दुंदुभि दोउ डारि॥
दोउ जंघ रंभ कंचन दिपत, घरी कमल हाटक तनै।
गति हंस लखत मोहत जगत, सुर नर मुनि धीरज हनै॥