‘साहिजिहा’ पतिसाह, राह दहुवै सिर रज्जै।

वाजा पूरब दिखण, उतर पछिम दिस बज्जै॥

पूत सपूत च्यारि, यळा चहुवै ज्या अप्पि।

ठावा ठौहड़ा ठौहड़, उथउ थाणा करि थप्पि॥

जाजुळी तेज जग चख्खि जिम, दुनिया ऊपरि देखियै।

नव खंड सप्त दीपह् नरिंद, लोह गहै कुण लेखियै॥

स्रोत
  • पोथी : बिन्है रासौ ,
  • सिरजक : महेसदास राव ,
  • संपादक : सौभाग्यसिंह शेखावत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान राज्य प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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