मृगया महँ जिहिं समय, सकल भुल्लिय बन माहीं।

महा घोर तम भयौ, तहाँ बरनी नहिं जाही॥

तदिन सेख संयोग, आनि हमसैं तब मिल्लिव।

नहिंन सेख तकसीर, देखि मन मोरहिं चल्लिव॥

संयोग भोग बिछुरन मिलन, लिख्यौ बिधाता दिन जहँ।

नहिं टरै लाख कोऊ करो सु तौ होय वह दिन तहँ॥

स्रोत
  • पोथी : हम्मीर रासो ,
  • सिरजक : जोधराज ,
  • संपादक : श्यामसुंदर दास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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