चित चंचल वय स्याम नैन मृग भ्रोइ अलिंगन।
तिल प्रसून तस समन सिंहासन मुख अधर विद्रुमन॥
अति कोमल सब अंग वयण सीतल अति हंस गति।
तन सूछिम कटि छीन प्रगटी दामनि देह द्युति॥
आनंद चंद पूरण वदन, मन पवित्र सब दिन रहें।
आहार निमख इच्छित अमल, विमल ठोर पदमनि लहें॥