जिती उब्बसी संग, सकल सम्मूह मिलिय वर।
बिचि सु मैन सह सैन गए, ऋषि निकट मरूकर॥
गावत बिविध प्रकार, करत लीला मन भाइय।
हाव भाव परभाव, करत आस्रम मैं आइय॥
ऋषि निकट आय होरिय रची, वर्षत रंग अनंग गति।
नन चलै चित्त ज्यों ज्यों अचल, करत कृया त्यों त्यों अमित॥