इंद्रजीत सूं एम, कहि रावण जदि कटंक।
जाव लड़ौ जुध मांझ, रांम सेना सुं इक रुख।
अब तौ या आ बणी, मरौ साम्हां चढि सम्मर।
बेटा अब बाप को, काज सारौ इसड़ी कर।
पाछा न पाव धरजै प्रकट, आधाइ दीजै अवनि।
जुध भड़ण रांम सूं जोरवर, पूर अबै व्हैजा पवन॥