आवंण तंन गुवंण भुवंण तंन था घंण, न कोइ जांयै न को मरै।

दौर न विसति विसतार नांव संपति, न कोई डूबै न को तीरै।

ओपति खपति न फळ अफळ पति, न कोइ नारी न को नरूं।

क्रतार क्रंम कायंम करंणीगर, हुंता तहीयां केम हरूं॥

स्रोत
  • पोथी : भारतीय साहित्य रा निरमाता : तेजोजी चारण ,
  • सिरजक : तेजोजी चारण ,
  • संपादक : कृष्णलाल बिश्नोई ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
जुड़्योड़ा विसै