छंद मुक्तादाम

कहै तब दूत सुनो नृप बात।
बड़ो तुव बंस प्रताप सुहात॥
तजो रतनागर को सर हेत।
रतन्न अमूल्य तजो रज हेत॥
स्रोत
  • पोथी : हम्मीर रासो ,
  • सिरजक : जोधराज ,
  • संपादक : श्यामसुंदर दास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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