मरम म वोलिसि वीरु, कुणहइ केरउ कुतिगिहिं।
जलनिहिं जिम गंभीरु, पुहुविइ पुरुष प्रसंसीइ ए॥
उछिनु धनु लेउ, त्यागि भोगि जे वीद्रवइ ए।
पवहणि तडि पगु देउ, जाणे सो साइरि पड़इ ए॥
एक कन्हइ लिइ ब्याजि, बीजाह्रइं व्याजि दीयए।
सो नर जीविय काजि, विस वह्नि वन संचरइ ए॥
ऊडइ जलि म न पइसि, अधिक म बोलिसि सुयणुस्युं।
सुनइ घरि म न पइसि, चउहटइ म विढिसि नारिस्युं॥
बोल विच्यारिय बोलि, अविचारीय घांघल पडइ ए।
मूरख मरइ निटोळ, जे धण जौवण वाउळा ए॥
बळ ऊपहरऊ कोपु, बळ ऊपहरी वेढि पुण।
म करिसि थापणि लोप, कूड़ओ किमइ म विवहरसे॥
म करिस जूयारी मित्र, म करिसि कलि धन सांपड़ए।
घणुं लडावि म पुत्र, कलह म करिजे सुयण सिउं तु॥
धनु ऊपजतउं देखि, बाप तणी निंदा म करे।
म गमु जन्मु अलेखि, धरम विहूणा धामीयहं॥
कंठ विहूणुं गानु, गुरु विहूणउ पाढ पुण।
गरथ विहूणुं अभिमान, ए मित्रइं असुहामणा ए॥