दीधा जिण्य दंत चरंण करि दोय चख, कवळ कवळ प्रापती कला।

सिर मुख दीया श्रवण नास्य कांनी रती, उदक विंद विसतार इला।

कीधा करी तारा विभासंण बांणी, जनम-जनम सो जपी परै।

ताय धंणीय तेज कव साचवतां, कर जोड़े सलाम करै॥

स्रोत
  • पोथी : भारतीय साहित्य रा निरमाता : तेजोजी चारण ,
  • सिरजक : तेजोजी चारण ,
  • संपादक : कृष्णलाल बिश्नोई ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
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