बसंत की रुत आई बाग़ां में बहार ल्याई
पीळी-पीळी सरसूं की क्यारी मुस्काई है।
भंवरा फूलां पै डोलै घूंघट सै कळी खोलै
डाळ-डाळ पात-पात तरुणाई छाई है।
बोलै है पपैया मोर कोयल मचावै शोर
राग रो महीनो आज रागणी सुणाई है।
बिरहण जोवै कंत चारुं ओर है बसंत
पीव रो संनेसो सुण काया हरसाई है॥