आवंण तंन गुवंण भुवंण तंन था घंण, न कोइ जांयै न को मरै।
दौर न विसति विसतार नांव संपति, न कोई डूबै न को तीरै।
ओपति खपति न फळ अफळ पति, न कोइ नारी न को नरूं।
क्रतार क्रंम कायंम करंणीगर, हुंता तहीयां केम हरूं॥