सूर मंडळ भेदहि सूरि समैं। चवसठ्ठि नचै तहां बीर रमैं॥
धन धाय संपूरण सूर मिळै। झटकान की बांह दुबाह झिलै॥
कर बाहत सांवत सागि कही। यत तै उत तै यक बेर बही॥
मुगलै तेंहि ठौर कबान गही। यक बार ही मार अपार भही॥
सिरदारन के जह लोह लगै। धन धाय छकै पुनि खेत वगै॥
हयराज की बाग उपारत ही। सिरदार तहां कर सागि गही॥
सु त्रंभगीय बांहिय यूं तरछी। सु बगत्तर फौरि गई बरछी॥
जिह बेर ‘हरी’ जस सेर भयौ। चक्रव्यूह नमाइ चलाय गयौ॥
बहु बाहत है रण तेग बळी। तिह बारह दीरघ धार चली॥
‘भावसिंघ’ जहां रणसिंघ भयौ। ‘रनछौड़’ जहां रण मांडि रयौ॥
पुनि ‘जैत’ जहां रन उपरिय। भर धावन तै घट यौ भरिय॥
बरियाम ‘करन्न’ को खेत बग्यौ। जहां राव ‘किसौर’ के गोरा लग्यौ॥
यक गोरा लग्यौ मुर तीर लगै। दोउ भाट भयै रिन ठाठ अंगै॥
उततै यक मीर बळी निकस्यौ। तिंह ऊपरि ‘सावर’ यो बिहस्यौ॥
बहतानि कमानि को तीर दियौ। यह सांगि सै मारि सुमार कियौ॥
तवि ‘सुंदर’ को ‘हदमाळ’ तहां। जब जोर परयौ तिहिं वार जहां॥
‘नवलौ’ सकतेस को यौं निहस्यौ। मनु बीजळ सी खग लै बिहस्यौ॥
‘रुकमागद’ अंगद ज्यौं रन में। धनधाय करै अरि के धन में॥
‘अचळौ’ अचळौ ‘अनुरुध’ अगै। रनरोह लियौ तन लोह लगै॥
सब सूरन में सुं ‘जोरावर’ सै। रन रूप कियै रुद्ररावर सै॥
सब सूरन की उपमा बरनौ। रनखेत हि फाग बसंत मनौ॥
अंगु लाल गुलालन तै अरचै। मनु रंग पंतगह के चरचै॥
सिरदार लौ सार अपार भये। रन भान जहां रथ खैंचि रये॥
जब भाजि गनीम की फौज गई। जिंह ठौरन गौरन बाग लई॥