सतिरि सहस साहणवइ साहण,

गई अरदास पासि सुरताणह।

कणगरु कोष लीध हरि हिंदू,

तू रणमल्ल इक्क नह बंदू॥

भावार्थ :- सत्रह सहस्र सेनाधिपतियों के शासन से सुल्तान के पास प्रार्थना की गई कि-हिंदू (राजा) रणमल्ल ने धान्य का बहुत बड़ा राजकीय कोष लूट लिया है और यह अकेला रणमल्ल ही आपकी सेवा करना स्वीकार नहीं करता है।

पुण फुरमाण आण सुरताणइ(णी),

नहि रणमल्ल गणइ रणताणइ(णी)।

जिम हम्मीर वीर सिम्भरवइ,

तिम कमधज्ज मूंछ मुहि मुरवइ॥

भावार्थ :- सुल्तान के पास पुनः समाचार आया कि रणमल्ल युद्ध-भय की परवाह नहीं करता था तथा जिस प्रकार सांभरपति चौहान हम्मीर मूँछों पर ताव दिया करता था उसी प्रकार यह कमधज वीर रणमल्ल मूँछें मरोड़ता है।

चंचलि चड़ी चिहू दिसि चंपइ,

थर थर थाणदार उर कंपइ।

कमधज करि धरि लोह लहक्कइ,

बिबहर बुबंअ बुबंअ बक्कइ॥

भावार्थ :- जब यह रणमल्ल घोड़े पर सवार होकर चारों दिशाओं को दबाता है, तब थानेदारों का हृदय थर-थर काँपने लगता है और यह कमधज वीर हाथ में तलवार लेकर झपटता है तो यवन बुम्ब (तोबा-तोबा) करने लगते हैं।

निसि खंभाइच नयर उध्रकइ,

धूंधळि धूंस पड़इ धूलक्कइ।

प्रह पुक्कार पड़इ (पढ़इं) पट्टण तळि,

रे रणमल्ल धाड़ि जब संभळि॥

भावार्थ :- यह रणमल्ल सायंकाल में खंभात नगर में प्रविष्ट होकर हलचल उत्पन्न कर देता है। धुंधले समय में धौलका नामक नगर में (इसका) नगाड़े पर डंका पड़ता है और प्रातःकाल के समय जब रणमल्ल वीर के आने का समाचार सुनाई देता है तब पाटण की तलहटी में पुकार मच जाती है।

मुहुड़ा (सि) या मीर रहमाणी,

दाम हराम करइ सुरताणी।

माल हलाल खान, खिजमत्ती,

तु रणमल्ल इक्क नह खित्ति॥

इस रणमल्ल ने अनेक यवन वीरों को पराजित कर दिया है और सुल्तान के धन को नष्ट कर रहा है। यह खान के माल-जायदाद को अपनी संपत्ति समझ रहा है तथा वह इस पृथ्वी पर आपकी सेवा स्वीकार नहीं कर रहा है।

इंक रणमल्ल राय सुणि आलमि,

रहिउ हुई हैराण खुंदाळम।

हेलां लाखबंद बुल्लावि,

लखि फुरमाण खान चल्लावि॥

भावार्थ :- समग्र जगत में एकमात्र राजा रणमल्ल को स्वतंत्र सुनकर सुल्तान आश्चर्यचकित हो गया। उसने तत्काल कासिद को बुलवाया और उसे अपना फरमान देकर खान के पास भेजा।

हय गय कटक थाट उल्लट्टिय,

दहु दिसि पंडरवेस पलट्टिय।

निहुटि वाटि काढ गढ़ घल्लि,

करुपराण रैयत रणमल्लि॥

भावार्थ :- फरमान में उल्लेख था कि रणमल्ल की रैयत पर दसों दिशाओं में यवन सैन्य, अश्वदल एवं हस्तीदल भेजकर आक्रमण करो और गढ़ का गुप्त मार्ग खोजकर उसे नष्ट कर दो।

ईडर भणी भींच सुरताणी,

फूं फूं कार फिरई रहमानी।

मूंगल मेच्छ मुहइ मच्छर भरि,

हसि हुसियार हुया हल-हल करि॥

भावार्थ :- इस प्रकार का आदेशपत्र प्राप्त करके सुल्तान के यवन वीर फुफकारते हुए ईडर को लक्ष्य बनाकर इधर-उधर घूमने लगे और कई सुल्तान-जातीय यवन मात्सर्यभाव युक्त मुँह से हँसते हुए सावधान हुए तथा चलो-चलो करने लगे।

स्रोत
  • पोथी : रणमल्ल छंद ,
  • सिरजक : श्रीधर व्यास ,
  • संपादक : मूलचंद ‘प्राणेश’ ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर
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