जां अंबर पुड़ तळि तरणि रमइ,
तां कमधज कंध न धगड़ नमइ।
वरि वड़वानळ तण झाळ समइ,
पुण मेच्छ न आपूं चास किमइ॥
भावार्थ :- जब तक गगनांगन में सूर्य क्रीड़ा करता रहेगा, तब तक इस रणमल्ल राठौड़ का शीश उस यवन के समक्ष नहीं झुकेगा। भले ही बड़वानल की लपटों का शमन हो जाय पर मैं किसी भी प्रकार से यवनों को पृथ्वी प्रदान नहीं करूँगा।
पुणु (पुण) रणरस जाण जरद्द जड़ी,
गुण सींगणी खंची खंती चड़ी।
छत्तीस कुलह बल करिसि (सु) घणुं,
पय मग्गिसिरा हम्मीर हम्मीर तणुं॥
भावार्थ :- मैं कहता हूँ कि- यदि युद्धोन्मत्त होकर क्षत्रिय वीरों ने कवच धारण कर लिए और उनके शृंगणी-धनुषों की प्रत्यंचाएँ चढ़ गईं तो छत्तीस कुलों के क्षत्रिय अत्यधिक शक्ति लगा देंगे और वे यवनों को राव हम्मीर का क्षीर प्रदान करेंगे। अर्थात् जिस प्रकार राव हम्मीर ने यवन सैनिकों को मृत्यु के घाट उतार दिया था उसी प्रकार हमारे क्षत्रिय वीर भी यवनों को मृत्यु के घाट उतार देंगे।
दळ दारुण दफ्फर खान जयी,
मिइं भग्गइ अग्गइ खग्ग रयि।
हिव पट्टण पध्दरि धरि सुपयं,
नइ विनड़िसु सत्तिरि सहस सयं॥
भावार्थ :- विजयी जफ़र खान के दारुण-दल को मैंने अपनी खड्ग के सामने भगा दिया था। अब तुम देखना पाटण को नष्ट करके, उसके शासक को पकड़ कर तथा उसके सत्रह सहस्र सैनिकों को स्ववश कर लूूँगा।
मिंइ संगरि समसुद्दीन नड़ी,
पड़ि भग्गउ अंगो अंगि भिड़ी।
जव मंडिसि मुझ रणमल्ल समं,
तव देखिसि लसकर सरिस जमं॥
भावार्थ :- मैंने युद्ध में शमसुद्दीन को स्ववश कर लिया था। वह मेरे साथ परस्पर युद्ध में पराङ्मुख होकर भाग पड़ा था। जब खान मेरे समक्ष युद्ध के लिए तत्पर होगा, तब उसकी सेना मुझे क्रुद्ध यमराज के समान देखेगी। अर्थात् यवन सैनिक मुझे देखकर भयभीत हो जाएँगे।
मम मोड़िय मंडि मलिक्क घणुं,
हुं समरि विडारण मेच्छ तणुं।
जव उठिसि हठि हक्कंत रणि,
तब न गणूं त्रण सुरताण तणि॥
भावार्थ :- मैंने युद्ध-तत्पर अनेक मलिकों को परास्त किया है। मैं युद्ध-स्थल में यवनों को तितर-बितर करने वाला हूँ। जब मैं युद्ध के लिए सन्नद्ध हो जाऊँगा तब (यह तो एक सुल्तान है) मैं तीन-तीन सुल्तानों की शक्ति को भी कुछ नहीं समझूँगा।
बळ बुल्लिम वल्लि मलिक्क कहि,
मम वरणिसि मुण (ा) सिम दुत मुहि।
जब चंपिसि ईडर सहरि तळं,
तब पेक्खिसि मुह रणमल्ल बळं॥
भावार्थ :- रणमल्ल ने पुनः इस प्रकार कहा- हे दूत! तुम अपने संरक्षक मलिक से मेरा कथन उचित प्रकार वर्णन कर देना। साथ-साथ यह भी कह देना कि जब तुम ईडर की तलहटी को दबाओगे तब मुझ रणमल्ल के वास्तविक पराक्रम को देखोगे।
हय हेडवि सवि हेजब्ब गया,
वहि वल्लि मलिक्क सलाम किया।
हिव करिसु धरा रणमल्लं मयं,
इम बोल्लइ हठि तोलंत हयं॥
भावार्थ :- सभी दूत अपने घोड़ों को लेकर चले गए। जाकर अपने संरक्षक मलिक को सलाम किया। तत्पश्चात् बोले- खुदावंद! रणमल्ल (तो) अपने घोड़े की जाँच करता हुआ, इस प्रकार कह रहा था कि-अब (अतिशीघ्र ही) समग्र पृथ्वी को यवनों से मुक्त कर दूँगा। अर्थात् यवनों के शासन को समूल विनष्ट करके ही छोड़ूँगा।
नर केसरी ईडर सिहरि धणी,
जव हेजब मुहि फरियाद सुणी।
तव चमकि ढमक्कि मलिक्क करी,
धसि धाड़िइ धायउ धूंस धरी॥
भावार्थ :- ईडरपति नरकेसरी (रणमल्ल) का कथन जब (मलिक ने) दूत के मुँह से सुना, तब वह अपने नगाड़ों पर डंडा देकर ईडर प्रदेश में लूटने के लिए चल पड़ा।