किते जीव संमूह देखंत भज्जैं।
मृगं ब्याध्र चीते रिछं जत्र गज्जैं॥
कहूँ कौलपुंजं कहूँ लीलगाहं।
कहूं चीतलं पांडुलं ब्याध्र नाहं॥