यह भी गेंद से खेला जाने वाला परंपरागत खेल है। इसमें एक खिलाड़ी को छोड़कर सभी के पास हॉकीनुमा लाठी (स्टिक) होती है जिससे गेंद पर प्रहार किया जाता है। खेल शुरू होने से पहले खिलाड़ी दांव तय करते हैं। इस प्रक्रिया में एक खिलाड़ी में डांव (गेंद को पकड़ने का दांव) पड़ता है। इस खिलाड़ी को पिदिया कहा जाता है। इसके बाद अन्य खिलाड़ी अपने पैरों से पाले बनाकर उनमें सावचेती से खड़े हो जाते हैं।

पिदिया उनके शरीर पर गेंद को मारकर किसी दूसरे को पिदिया बनाने की कोशिश करता है। ऐसे में पाले में खड़े खिलाड़ी अपने शरीर पर गेंद लगने से बचने के लिए स्टिक का सहारा लेते हैं। इस दौरान किसी खिलाड़ी को पिदिये द्वारा फेंकी गेंद लग जाती है तो उसे पिदिया बनना पड़ता है। इसके बाद स्टिक वाले सभी खिलाड़ी गेंद को इधर-उधर मारते-धकेलते हैं। यदि किसी खिलाड़ी द्वारा मारे गए शॉट की गेंद को पिदिया कैच कर लेता है तो शॉट मारने वाले खिलाड़ी को उसके स्थान पर पिदिया बनना पड़ता है। यह काफी सक्रियता वाला खेल है। इसमें हरेक खिलाड़ी को अपनी मुक्ति बनाए रखने का प्रयास करना पड़ता है। इससे अच्छा व्यायाम भी होता है।

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