श्री महावीरजी का स्थल राजस्थान के करौली जिले में स्थित है, जहां चैत्र शुक्ल त्रयोदशी से लेकर वैशाख कृष्ण प्रतिपदा तक एक बड़ा मेला भरता है। इस मेले में देश के कोने-कोने से जैन तीर्थ यात्री आते हैं। इस मेले में जैन समाज के अलावा मीणा, अहीर और गुर्जर जातियों के लोग भी भाग लेते हैं। मेले का शुभारंभ ध्वजारोहण के साथ होता है और इस अवसर पर भजन गायन के अनेक सांस्कृतिक आयोजन होते हैं।
श्री महावीरजी के स्थल का पुराना नाम चंदन नामक गांव था। इसका नाम परिवर्तित होने के पीछे लोक में एक कथा प्रचलित है। किसी समय में इस गांव में निवास करने वाले एक चर्मकार की गाय प्रतिदिन निकट के ही एक टीले पर चरने के लिए जाया करती थी। जब वह चरकर संध्या समय घर लौटती तो उसके थनों में दूध नहीं होता था। संध्या के समय जब चर्मकार गाय का दूध निकालने बैठता तो वह लात मार देती। ऐसे में उसे संदेह हुआ कि सुबह के समय आराम से दूध देने वाली गाय शाम को इतनी उग्र क्यों हो जाती है। उसे लगा कि दिन में चरते समय कोई दूध निकालकर ले जाता है। उसने गाय का पीछा किया और अंत में गाय एक टीले पर आकर रूक गयी। वहां पहुंचने के बाद गाय के थनों से स्वत: ही दूध बहने लगा। यह दृश्य देखकर के चर्मकार दंग रह गया। वह भागते हुए गांव पहुंचा और उक्त वृतांत ग्रामीणों को सुनाया। गांव वाले भी उसकी बात सुनकर दंग रह गए और भागते हुए उस टीले पर जा पहुंचे। उन्हें लगा कि हो न हो, टीले के नीचे कुछ न कुछ चमत्कारिक जरुर है। इसके बाद लोगों ने टीले को खोदना शुरू किया। इन लोगों में कुछ जैन संप्रदाय के लोग भी थे। काफी खुदाई करने के बाद नीचे भगवान महावीर की लाल पत्थर से बनी एक सुंदर प्रतिमा निकली। लोगों ने उसे ले जाना चाहा पर प्रतिमा को जरा सा भी नहीं हिला सके। थक-हारकर लोगों ने एक चबूतरे पर यह प्रतिमा स्थापित कर दी। इसके बाद यह स्थल जैन, मीणा, गुर्जर और अहीरों का आराध्य-स्थल बन गया। कालांतर में यहां भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।
श्री महावीर जी के मेले का शुभारंभ करने से पूर्व दीर्घकाल से चली आ रही एक परंपरा का पालन आज भी किया जाता है। मेला आरंभ होने से पहले रथयात्रा निकलते समय रथ पर उस चर्मकार के वंशजों का हाथ लगाकर रथ को आगे बढ़ाया जाता है। कहा जाता है कि एक-दो बार अन्य लोगों ने चर्मकार वंशजों का हाथ लगवाए बिना रथ चलवाना चाहा पर रथ रत्तीभर भी नहीं हिला। उसके बाद पुरानी परंपरा का पालन करते हुए हरेक मेले के शुभारंभ के समय चर्मकार के वंशजों को सम्मान सहित आमंत्रित किया जाने लगा।
श्री महावीर जी का मेला देश में अनूठा और सर्वधर्म सद्भाव का अनुपम उदाहरण है। यह मंदिर और मेला जैन मतावलंबियों के अलावा मीणा, गुर्जर और अहीर जातियों की असीम श्रद्धा का केंद्र है।