शीतला माता राजस्थान में ही नहीं, अपितु पूरे उत्तर भारत में लोक आस्था का केंद्र है। शीतला माता की पूजा चैत्र कृष्णा सप्तमी को की जाती है। शीतला सप्तमी के दिन लोग पहले दिन बनाया हुआ ठंडा भोजन ग्रहण करते हैं। शीतला सप्तमी के पहले दिन घरों में कई प्रकार की भोजन-सामग्री तैयार की जाती है और अगले दिन शीतला माता के पूजन के उपरांत भोजन किया जाता है। राजस्थानी भाषा में इस पर्व को ‘बास्योड़ा’ कहा जाता है। इस पर्व के पीछे यह भी संकेत होता है कि आने वाले दिनों में हल्का व ठंडा भोजन करना स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा।
राजस्थान में शीतला सप्तमी के दिन कई मेले लगते हैं। इन मेलों में शीतला माता का सर्वाधिक बड़ा मेला शील की डूंगरी (छोटी पहाड़ी) पर भरता है। यह जगह जयपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर चाकसू कस्बे के पास है। यहां एक पहाड़ी पर शीतला माता का मंदिर बना हुआ है जहां शीतला सप्तमी के दिन बड़ा मेला भरता है।
शीतला माता के इस मंदिर का निर्माण जयपुर शासक माधोसिंह ने करवाया था। शील की डूंगरी पर लगने वाले मेले में राजस्थान के अलावा अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु आकर शीतला माता के दर्शन करते हैं। मेले के दिन यहां का दृश्य बड़ा अद्बभुत होता है। बैलगाड़ियों पर सवार और पदयात्रा करते यात्रियों व गीत गाती महिलाओं को देखकर लोक रंग की सुरंगी छटा सामने आती है। यहां रातभर जागरण चलता रहता है। इस दिन लगभग एक लाख लोग शीतला माता का दर्शन करते हैं।
परंपरा के अनुसार शीतला माता मंदिर में पुजारी कुम्हार (कुंभकार) जाति का होता है। इस कुम्हार कुटुंब के लोग पंद्रह दिन में बारी-बारी से माता की दिन में दो बार आरती करते हैं और अपने हिस्से का चढ़ावा लेते हैं।
राजस्थान और समीपवर्ती राज्यों में शीतला माता को मातृरक्षिका देवी के रूप में पूजा जाता है। शीतला माता को महामाई और मातामाई नामों से भी जाना जाता है। यही देवी पश्चिमी भारत में माई अनामा और राजस्थान में सेढळ माता नाम से जानी जाती है। लोकमान्यता है कि चेचक रोग का प्रकोप शीतला माता के रूठने के कारण होता है और उन्हीं की कृपा से इस रोग से मुक्ति मिलती है। शीतला माता को बच्चों का संरक्षण करने वाली देवी माना जाता है।