
राजस्थान के अजमेर जिले के पुष्कर कस्बे में हर माह की पूर्णिमा को मेला भरता है पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन लगने वाले मेले का विशेष महत्व है। इस दिन यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। पूरे कार्तिक मास में यहां यात्री आते रहते हैं। इन दिनों में प्रात: 3-4 बजे से ही पुष्कर झील के घाटों पर श्रद्धालु एकत्र हो जाते हैं जो नारियल, फूल और चंदन की धूप से पूजन व तर्पण आदि करते हैं। यहां पत्तों पर दीपक रखकर सरोवर में तैराए जाते हैं जिसे दीपदान कहा जाता है। यह परंपरा पौराणिक युग से चली आ रही है।
पुष्कर सरोवर के किनारे ही ब्रह्माजी का मंदिर बना हुआ है जो देश का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है। मुगल काल में इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया था पर बाद में इसका आकर्षक पुनर्निमाण करवाया गया। इस मंदिर के पीछे की पहाड़ियों पर माता सावित्री और गायत्री माता के मंदिर बने हुए हैं।
यह स्थल कई तीर्थों का संगम स्थल है। जैसे ज्येष्ठ पुष्कर के अलावा पुष्कर के पास ही कनिष्ट और मध्यम पुष्कर भी बने हुए हैं। इनके बारे में लोकमान्यता है कि जब ब्रह्माजी ने यहां यज्ञ करने का निश्चय किया तो उनके हाथ से कमल के तीन फूल गिरे। ये पुष्प जहां-जहां गिरे, वह जगह स्वच्छ जल वाले सरोवरों में बदल गई और इन्हीं सरोवरों को क्रमश: ज्येष्ठ पुष्कर, मध्यम व कनिष्ट पुष्कर कहा जाता है।
ज्येष्ठ पुष्कर से लगभग एक किलोमीटर दूरी पर भर्तृहरि की तपोस्थान गुफा स्थित है। लोकमान्यता है कि वैराग्य धारण करने के बाद राजा भर्तृहरि ने इसी गुफा में आकर तपस्या की थी। इसी गुफा से तकरीबन 6-7 किलोमीटर की दूरी पर गयाकुण्ड है। यहां पर हर माह के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को यदि मंगलवार हो तो यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजन के लिए आते हैं। लोक में इस स्थल की मान्यता गया-तीर्थ के स्वरूप मानी जाती है। यही कारण है कि यहां इतनी बड़ी संख्या में आस्थावान लोग विशेष अवसरों पर जुटते हैं।

अनेक श्रद्धालु तीनों पुष्करों की परिक्रमा करते हैं जिसे चौबीस कोस की परिक्रमा कहा जाता है। इस यात्रा में यात्री पुष्कर के आसपास के क्षेत्रों का सुरम्य प्राकृतिक वातावरण देखकर एकदम तरोताजा हो जाते हैं।
पुष्कर तीर्थ का सबसे भव्य आकर्षण केन्द्र यहां लगने वाला बाजार है। इस मेले में दुकानदार कार्तिक माह से एक माह पहले ही अपनी दुकानों में तरह-तरह के सामान सजाकर आकर्षण बढ़ा देते हैं। इस दौरान यहां ऊंट और अन्य पालतू पशुओं का मेला भी लगता है जिसमें पश्चिमी राजस्थान के बहुत सारे पशुपालक अपने पशुओं यथा ऊंट, बैल आदि का क्रय-विक्रय करने के लिए आते हैं।
इस मेले में विश्वप्रसिद्ध ऊंटदौड़ जैसी प्रतियोगिताएं और राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा कई सांस्कृतिक आयोजन किए जाते हैं। इन आयोजनों को देखने के लिए स्थानीय लोगों के अलावा विदेशी पर्यटक भी भारी संख्या आते हैं। ऊंटों की दौड़ और तरह-तरह की प्रतियोगिताएं लोगों के आकर्षण का केन्द्र होती हैं।
मेले के दौरान लगने वाली दुकानों में मोहरबंद आभूषण, मालाएं, घंटियां, हाथीदांत से बने आभूषण, झूले, पीतल के बर्तन, छपाई वाले कपड़े आदि खूब पसंद किए जाते हैं और खरीदे जाते हैं। इस मेले में मनिहारी और अन्य सौंदर्य-प्रसाधनों की छोटी-छोटी दुकानें सजी होती हैं जिनमें युवतियां और महिलाओं की खूब भीड़ उमड़ती है।

पुष्कर मेले में अनेक लोक प्रचलित खेलों का आयोजन किया जाता है जिससे राजस्थानी लोकजीवन जीवंत हो उठता है। इन खेलों में ऊंट-दौड़, ऊंट-सज्जा, रस्साकसी, दौड़, मूंछ-प्रदर्शन आदि खास हैं। इस मेले में राजस्थान में लोकगाथा गायन में दक्षता रखने वाली जातियों द्वारा अपना हुनर प्रदर्शित किया जाता है।
इस प्रकार पुष्कर को अनेक मेलों का संगम कहा जा सकता है और इसे पूरे भारत में राजस्थानी संस्कृति को प्रदर्शित करने वाले मेलों में गिना जाता है।