कूमठ बबूल (Mimosaceae) कुल का वानस्पतिक पेड़ है। इसे राजस्थान के कुछ हिस्सों में कुंभट भी कहा जाता है। कूमठ की ऊंचाई 4 से 8 मीटर तक होती है। इसका तना हल्के पीले (धूसर) रंग का होता है। इस मरुस्थलीय पेड़ पर लगने वाली फलियों के बीजों को कुमठिया या हिलारिया कहा जाता है। इनका उपयोग सब्जी बनाने में किया जाता है। कुमठिए  भूरे रंग के गोलाकार बीज होते हैं जिनका आकार 1 सेमी के लगभग होता है।

कूमठ के पत्ते बेहद छोटे-छोटे होते हैं जिनका प्रयोग भेड़-बकरियों आदि के चारे में किया जाता है। कूमठ की लकड़ी भी काफी उपयोगी होती है जिससे घरेलू काम में आने वाली चीजें और औजार (हाथ चक्की की कील, मूसल और कृषि उपकरण) बनाए जाते हैं। इस पेड़ से उत्तम श्रेणी का खाने योग्य गोंद प्राप्त किया जाता है। यह पेड़ खेतों की मेड़ पर होने वाले मृदा अपरदन को रोकने में भी सहायक होता है।

कूमठ के उत्पाद

कूमठ के पेड़ से ईंधन और पशुचारे के साथ-साथ कई अन्य उत्पाद भी मिलते हैं। इनमें बीज और गोंद प्रमुख हैं। कूमठ पर लगने वाली फलियों से बीज (कुमठिया या हिलारिया) निकालकर सब्जी बनाई जाती है। यह सब्जी गीले और सूखे दोनों प्रकार के बीजों से बनाई जा सकती है। गीले कुमठियों को फली से निकालने के बाद साफ करके सब्जी बनाई जा सकती है तो सूखों को उबालने के बाद सब्जी तैयार की जाती है। राजस्थान के मरुस्थलीय भू-भाग में हरी सब्जियों का उत्पादन कम होने के कारण यहां के लोग अनेक चीजों को सुखाकर बाद में सब्जी बनाने में काम में लेते हैं। कुमठिया भी इनमें से एक है। इन सूखे बीजों को लंबे समय तक संरक्षित रखने के लिए साफ करने के बाद गर्म पानी में नमक डालकर उबालकर रख लिया जाता है।

कुमठियों की सब्जी बनाने का तरीका

सूखे कुमठियों की सब्जी बनाने के लिए पहले दिन बीजों को गर्म पानी में भिगोकर रख दिया जाता है ताकि वे अच्छी तरह से मुलायम हो जाएं। इसके बाद भरपूर मसाले डालकर सब्जी बनाई जाती है जो खाने में काफी स्वादिष्ट होती है। लोकप्रिय राजस्थानी सब्जी ‘पंचकूटा के साग’ में भी इसे डाला जाता है।

कुमठिया के बीज और गोंद के सेवन से होने वाले फायदे

कूमठ के पेड़ पर कुमठियों के साथ गोंद भी लगता है। इसे ‘अरेबिक गोंद’ कहा जाता है। इसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं, खाने-पीने के उत्पादों के साथ उद्योगों में भी होता है। हाल ही में कूमठ के पेड़ से अधिक गोंद उत्पादन के लिए केंद्रीय शुष्क अनुसंधान केंद्र (काजरी), जोधपुर द्वारा इथेफॉन हार्मोन के टीके को तैयार किया गया है। इस टीके को पेड़ के तने में जमीन से 1 फीट ऊपर तकरीबन 6 इंच का छेद करके लगाया जाता है, जिससे 500 ग्राम प्रति पेड़ गोंद-उत्पादन बढ़ जाता है।

कूमठ का गोंद और कुमठियों का सेवन स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। कूमठ के बीजों में  कार्डियोप्रोटेक्टिव रासायनिक गुण होते हैं। इनका सब्जी या अन्य तरीके जैसे चाट और कढ़ी के माध्यम से सेवन करना हृदय, लीवर, गुर्दे और यकृत के लिए उपयोगी होता है। इन्हीं गुणों को देखते हुए कूमठ के बीजों का प्रयोग कई आयुर्वेदिक दवाओं में होता है। आंत की विकृतियों से जुड़े रोगों को ठीक करने में कुमठिये काफी उपयोगी होते हैं। बीजों की चिकनाई के कारण साबुन उद्योगों में इन्हें कच्चे माल के तौर पर काम में लिया जाता है।

कूमठ के गोंद में प्रोटीन, विटामिन, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होता है। राजस्थान में प्रसव के बाद महिलाओं को इस गोंद से बने लड्डू खिलाए जाते हैं। पुरुष भी सर्दियों में कूमठ के गोंद को मिलाकर बनाए गए लड्डुओं का सेवन करते हैं। भारत में गम की गुणवत्ता निर्धारित करने वाली एजेंसी 'फारमेकोपिया ऑफ इंडिया' के अनुसार कूमठ का गोंद पूर्ण रुप से खाद्य-मानकों पर खरा उतरा है। इसके कुछ फायदे निम्न हैं -

आयुर्वेदिक दवाओं में उपयोग : प्रोटीन और विटामिन होने के कारण कई आयुर्वेदिक दवाओं में कूमठ के गोंद का प्रयोग होता है।

प्रसव के बाद दूध की वृद्धि : प्रोटीन की भरपूर मात्रा होने के कारण नवप्रसूता महिलाओं को गोंद के लड्डू बनाकर खिलाए जाते हैं, जिससे दूध की मात्रा बढ़ जाती है। इससे शिशुओं के कुपोषण का शिकार होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं।

रीढ़ की हड्डी को मजबूती :  कूमठ के गोंद में कैल्शियम की भरपूर मात्रा होती है, जिससे  हड्डियों को मजबूती मिलती है। खासतौर से रीढ़ की हड्डी को मज़बूत करने के लिए इसका सेवन बहुतायत से होता है।

उद्योगों में गोंद का उपयोग :  कपड़ा, कागज, चर्वण निर्यात, खाद्य सामग्री और सौंदर्य सामग्री में कूमठ के गोंद का उपयोग किया जाता है।

किसानों को कूमठ-वानिकी से आर्थिक फायदे

कूमठ के पेड़ को परंपरागत रुप से मेड़ पर मृदा के अपरदन को रोकने के लिए लगाया जाता रहा है। इसकी लकड़ी का प्रयोग रसोई में ईंधन के अलावा कृषि और घरेलू औजारों के हत्थे बनाने में किया जाता है। पहले कूमठ के बीजों और गोंद का घरेलू उपयोग किया जाता था पर आजकल इनका व्यवसायिक उपयोग होने लगा है। कूमठ-वानिकी के माध्यम से काफी लोगों को रोजगार भी मिला है। कूमठ के सूखे बीजों और गोंद को बाजार में बेचकर नकद कमाई की जाने लगी है। मरुस्थल के लोगों को इससे ईधन की लकड़ी आसानी से सुलभ हो जाती है। इसकी कांटेदार टहनियों से खेतों के चारों ओर बाड़ बनाकर जंगली और आवारा पशुओं से फसलों की रक्षा की जाती है। इस प्रकार कूमठ का पेड़ राजस्थान की वानिकी के लिए बेहद उपयोगी है।

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