खींप राजस्थान में बहुतायत से उगने वाला झाड़ीनुमा पौधा है। शुष्क या अन्य मरुद्भिद पौधों की विशेषताओं की भांति इसमें भी पत्ते बेहद छोटे आकार के होते हैं। खींप का वैज्ञानिक नाम लेप्टेडीनिया पाइरोटेक्निका (Leptadenia pyrotechnica) है। इसका तना सीधा और हरा होता है जिसकी अधिकतम ऊंचाई एक मीटर होती है।

खींप के झाड़ीनुमा पौधे में अगस्त-सितम्बर माह में हल्के पीले रंग के छोटे-छोटे फूल आते हैं जिनके साथ रूई लगी होती है। पकने के बाद यही रूई इन बीजों को हवा के बहाव में उड़ाकर रेगिस्थानी भूमि बिखेर देती है। खींप में नवंबर के माह तक फूलों में पकाव आता है और ये फलियों में बदल जाते हैं। इन फलियों को 'खिंपोली' कहा जाता है जिनसे सब्जी और अचार बनता है।

खींप एक सामान्य पौधा नहीं है बल्कि अनेक गुणों का भंडार है। यह मरुस्थलीय भूमि में रेतीली मिट्टी के अपरदन को रोकने में बेहद उपयोगी है। इसके अलावा खींप की जड़, तना, रस व फलियां इंसानों के साथ-साथ दुधारू पशुओं के अनेक रोगों को दूर करने में मददगार होते हैं। इसकी सूखी टहनियों से छप्परनुमा घर बनाए जाते हैं। घर और पशुओं के बाड़े को बुहारने के लिए इसकी टहनियों से झाड़ू भी बनाई जाती हैं।

खेत में काम करते समय कांटा चुभने या चोट लगने पर प्राथमिक उपचार के रूप में खींप का रस लगाया जाता है जिससे गहरे तक चुभा कांटा निकल आता है और चोट के घाव के इलाज में भी मदद मिलती है।

खींप के उपयोगी बिंदु

वानस्पतिक महत्व


यह एक बहुवर्षीय पौधा है जो रेतीले धोरों में आसानी से पनपता है, सूखा प्रतिरोधी है और मिट्टी को बांधकर रखता है।

औषधीय गुण


इसका रस पुराने कांटे या मवाद को निकालने में कारगर है। यह रस त्वचा की खुजली, चर्म रोग और पशुओं के इलाज में भी उपयोगी है। पिछले कुछ वर्षों में इसके औषधीय गुणों पर अनुसंधान से पता लगा है कि यह अनेक तरह के फंगल इन्फेक्शन, कैंसर, बैक्टीरिया आदि के उपचार में उपयोगी है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाता है। खींप का रस मधुमेह को भी नियंत्रित करता है।

आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ


यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रस्सियों और चारे के लिए एक सस्ता स्रोत है। इसके साथ ही मरुस्थलीकरण को रोकने में प्राकृतिक रक्षक है।

खिंपोली की सब्जी 

खींप की फली को खिंपोली कहा जाता है। यह फ़रवरी अंत और मार्च के प्रारंभ में कुछ ही दिन मिलती है। सब्जी के लिए खिंपोली को कच्चा तोड़ना पड़ता है। पकने के बाद इस पर रेसा आ जाता है। इसकी सब्जी और कढ़ी बनाई जाती है जो बहुत स्वादिष्ट होती है। खिंपोली को हल्का सा उबाल कर सुखा लिया जाता है जो साल भर सब्जी के लिए काम लिया जा सकता है।

आजकल राजस्थान के काफी भागों में खींप का पौधा तेजी से विलुप्त हो रहा है जो मरु-पारिस्थिकी के लिए काफी घातक है। इसके कारण मरुस्थल का विस्तार हो रहा है। खींप जैसी उपयोगी वनस्पति का सरंक्षण बेहद आवश्यक है।

जुड़्योड़ा विसै