राजस्थान के करौली जिले में त्रिकुट पर्वत की घाटी में स्थित कैलादेवी मंदिर में चैत्र मास की शुक्ला अष्टमी के दिन मेला भरता है। इस अवसर पर लाखों लोग माता के दर्शन करने के लिए जुटते हैं। इस दौरान त्रिकूट पर्वत की घाटी का रास्ता मंदिर में जाने वाले दर्शनार्थियों के कंठ-स्वरों से उठती भजन लहरियों से गूंज उठता है। हर आयु वर्ग के श्रद्धालु स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और बुजुर्ग आस्था का कुंभ लिए मंदिर की तरफ बढ़ते जाते हैं। इस मेले में परंपरागत राजस्थानी वेशभूषा पहने हुए भक्तजन कैलादेवी के भजनों को विविध रागों में गाते हुए माता के जयघोष के साथ आगे बढ़ते हैं। यहां आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु के मुंह से एक लोकप्रिय भजन लगातार गाया जाता है जो इस तरह से है –
‘कैलादेवी के भवन में घुटन खेलै लांगुरिया।’

 

कैलादेवी मेले में राजस्थान के अलावा देश के अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु देवी के दर्शनों के लिए  आते हैं और अपनी मनौती मांगते हैं। कैलादेवी की पूजा में किसी भी प्रकार की पशुबली नहीं दी जाती है। कैलादेवी की प्रतिमा का निर्माण कब और किसने करवाया, इसके बारे में कोई निश्चित तथ्य सामने नहीं आया है।

 

रियासती काल में करौली पर यदुवंशी शासकों का अधिकार था। इन्हें श्रीकृष्ण का आराध्य माना जाता है। कैलादेवी के बारे में लोक में एक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार जब कंस ने वासुदेव और देवकी को कारागृह में कैद कर लिया तो कुछ समय बाद देवकी ने एक पुत्री को जन्म दिया। जब कंस को यह सूचना मिली तो उसने नवजात कन्या को धरती पर पटककर मारना चाहा पर वह कन्या उसके हाथों से छूटकर आकाश की तरफ उड़कर ओझल हो गई। यही चमत्कारी योगमाया कुछ समय बाद भूमंडल पर अवतरित हुई और करौली के त्रिकूट पर्वत पर स्थापित होकर कैलादेवी के नाम से विख्यात हुई।

 

कैलादेवी से जुड़ी कुछ अन्य मान्यताएं भी लोकजीवन में प्रचलित हैं। कथाएं और लोकमान्यताएं भले ही कुछ भी हों पर यह तो तय है कि इस क्षेत्र के लोगों की जितनी श्रद्धा कैलादेवी में है, उतनी अन्य देवी-देवताओं में नहीं है। लंबे समय तक राज्याश्रय में पूजनीय स्तर मिलने के कारण कैलादेवी की प्रतिष्ठा बड़े क्षेत्र में है।

 

विगत कुछेक वर्षों में कैलादेवी स्थल बेहतरीन व्यवस्थाओं वाले पर्यटन स्थल में बदल गया है और यहां आने-जाने व रूकने-ठहरने की अच्छी सुविधाएं हैं। कैलादेवी क्षेत्र की रमणीयता देखकर यहां आने वाला हर श्रद्धालु प्रभावित हो जाता है और अगले मेले में आने का संकल्प लेकर घर वापिस जाता है।

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