
जीणमाता मंदिर राजस्थान के सीकर जिले के निकटवर्ती गांव रेवासा की दक्षिणी पहाड़ियों में स्थित है। यह मंदिर केवल पूर्वी दिशा की तरफ से खुला हुआ है, शेष तीनों दिशाएं पहाड़ियों से घिरी हुई हैं। इस मंदिर में जीण माता की अष्टभुजी प्रतिमा स्थापित है जिसके सामने तेल और घी के दो दीपक अखण्ड रूप से प्रज्वलित होते रहते हैं। ज्योति-प्रज्वलन की यह परंपरा सैंकड़ों वर्षों से चली आ रही है। कहा जाता है कि इन अखण्ड ज्योतियों की शुरूआत दिल्ली के चौहान शासकों द्वारा की गई थी। मुगलों के शासनकाल में यह व्यवस्था बंद हो गयी तो आमेर (जयपुर) के शासकों ने दीप-प्रज्वलन का व्यय देना आरंभ किया। आमेर रियासत की यह व्यवस्था रियासती शासन की समाप्ति तक चलती रही।
कहा जाता है कि जीणमाता मंदिर का निर्माण विक्रमी संवत 1121 में मोहिल नामक शासक द्वारा किया गया था। इस मंदिर के देवालयों की छतों और दीवारों पर बौद्ध-तांत्रिकों व वाममार्गियों द्वारा की गयी तपस्या एवं साधना से सम्बन्धित अनेक निर्वसन पाषाण प्रतिमाएं बनी हुई हैं। इस मंदिर के पाषाणजनित मार्ग की समाप्ति के बाद तकरीबन पांच हजार बीघा भूमि में फैला हुआ जंगल शुरू होता है। इसी जंगल की पहाड़ियों में स्वच्छ जल के दो झरने और जोगी तालान नामक एक जलकुंड स्थित हैं।
लोकमान्यता है कि वनवास काल में पांडव भ्राताओं ने भी कुछ समय यहां बिताया था। यहां पांचों पांडवों की पत्थर से बनी आदमकद प्रतिमाएं बनी हुई हैं।
जीणमाता के बारे में राजस्थान में एक लोकाख्यान बेहद प्रसिद्ध है जो बेहद कारुणिक है। जीण और हर्ष दो सगे बहन-भाई थे जिनके माता-पिता बचपन में ही चल बसे थे। दोनों बहन-भाई में अगाढ़ स्नेह था। युवा होने पर हर्ष का विवाह हुआ। एक दिन जीण अपनी भाभी के साथ पनघट पर पानी लाने गई तो मार्ग में दोनों में किसी बात को लेकर तनातनी हो गयी। इसी नोकझोंक के दौरान भाभी की कोई बात जीण को चुभ गयी और वह पितृगृह का त्याग करके चली गयी। घटना का पता चलने के बाद बहन के स्नेह में बंधा हर्ष उसे घर वापस लाने के लिए निकल गया। काफी तलाश करने के बाद उसे एक स्थान पर जीण तपस्या में लीन बैठे हुए मिली। हर्ष ने घर वापस आने के लिए उससे खूब अनुनय किया पर जीण तपस्या में लीन रही। अपनी बहन को घर आने के लिए मनाने में विफल रहा हर्ष भी पास में ही तपस्या करने लगा। दोनों की लंबी और कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनको दर्शन देकर आशीर्वाद दिया। जीण और हर्ष की यही तपोस्थली ‘जीण माता मंदिर’ के रूप में विख्यात है।

जीण माता का मंदिर सुरम्य स्थल होने के कारण तीर्थयात्रियों में बेहद लोकप्रिय है और यहां पूरे वर्ष यात्रियों की भीड़ लगी रहती है। चैत्र और अश्विन माह के नवरात्रों के दौरान यहां श्रद्धालुओं की विशेष चहल-पहल रहती है। इस दौरान राजस्थान के सुदूर अंचलों के साथ-साथ बंगाल, बिहार, आसाम, गुजरात, उत्तरप्रदेश और हरियाणा आदि प्रदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी मनोकामना की सिद्धि के लिए यहां पहुंचते हैं। जीण मंदिर में विवाह की जात देने, बच्चों के मुंडन-संस्कार और अन्य मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आस्थावान लोग यहां आकर धोक (पूजा) लगाते हैं।